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श्रीमती सुशीला पाटनी
आर.के. हाऊस,
मदनगंज- किशनगढ (राज.)

पूजन एवं आहार दान संबंधी निर्देश :

1. पड़गाहन :

हे स्वामिन्! नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु, अत्र… अत्र… तिष्ठ… तिष्ठ… (मुनिराज के रुकने पर 3 परिक्रमा लगाएं) यदि आर्यिका माताजी हों तो- हे माताजी! वंदामि… वंदामि… वंदामि… अत्र… अत्र… अत्र… तिष्ठ… तिष्ठ… तिष्ठ…

यदि ऐलकजी, क्षुल्लकजी, क्षुल्लिकाजी हों तो हे स्वामी/ हे माताजी इच्छामि, इच्छामि, इच्छामि, अत्र… अत्र… तिष्ठ… तिष्ठ…

(विधि मिलने पर : हे स्वामी/ हे माताजी… मम गृह प्रवेश कीजिए (गृह प्रवेश पर)

2. उच्चासन : चौकी, पाटे पर विराजमान कराने हेतु कहें… हे स्वामी उच्चासन पर विराजमान होइए…

(उच्चासन के पश्चात)

3. पाद प्रक्षालन :

मुनिराज के चरण एक थाली में रखवाकर एक कलश में गुनगुना जल लेकर धोएं। चरण धोने के पश्चात सभी लोग गंधोदक माथे पर लगाएं। गन्धोदक लगाने के बाद प्रासुक जल से सभी दाता अपने-अपने हाथ धोएं।

1. आहार नवधा भक्तिपूर्वक ही दें, क्योंकि इस विधिपूर्वक दिया गया आहार दान ही पुण्य बंध का कारण होता है।

नवधा भक्ति- (1) पड़गाहन, (2) उच्चासन, (3) पाद प्रक्षालन, (4) पूजन, (5) नमन,
(6) मन शुद्धि, (7) वचन शुद्धि, (8) काय शुद्धि, (9) आहार एवं जल शुद्धि।

नोट : यदि साधु का नाम मालूम है तो नाम लेकर पूजन करें नहीं तो बिना नाम के भी पूजन कर सकते हैं। यदि साधु का स्वास्थ्य खराब है या समय नहीं हो तो उदक चंदन आदि बोलकर अर्घ्य भी चढ़ा सकते हैं।

पूजन विधि-

पूज्यश्री जी के चरणों में हम, झुका रहे अपना माथा,
​जिनके जीवन की हर चर्या, बन पड़ी स्वयं ही नवगाथा।

​जैनागम का वह सुधा कलश, जो बिखराते हैं गली-गली,
​जिनके दर्शन को पाकर के, खिलती मुरझाई हृदय कली।।

ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्र! अत्र अवतर-अवतर संवौशट् आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्र अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वशट् सन्निधिकरणम्।।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय संसार ताप विनाशनाय चंदनम् निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय अक्षय पद प्राप्ताये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय काम वाण विध्वं सनाय पुष्पम् निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय मोहन्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
ॐ ह्रीं श्री… … … … … सागरजी मुनीन्द्राय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैष्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्घ्यकैः।
धवल-मंगल-गान-रवाकुले मम् गृहे मुनिराजमहं यजे।।

ॐ ह्रीं श्री … … … … .. सागरजी मुनीन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पूजन के पश्चात

4. नमन :

सभी हाथ जोड़कर नमन करें। हे स्वामी नमोस्तु। नमन के पश्चात सभी दाता हाथ धोकर भोजन की थाली, जिसमें आहार सामग्री हो, साधुजी को दिखाएं। मुनिराज आहार सामग्री में से जो भी निकालने का इशारा करें, उसे निकालकर अलग कर दें। मुनिराज के आहार में न दें।

भोजन की थाली दिखाने के पश्चात :

​सभी चौके में उपस्थित दाता शुद्धि बोलें- मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि, आहार-जल शुद्ध है। हे स्वामी मुद्रिका छोड़ अंजुली बांध आहार ग्रहण करें।

सोला- सोलह प्रकार की शुद्धि :

1. द्रव्य शुद्धि-

(अ) अन्न शुद्धि- खाद्य सामग्री सड़ी-गली, घुनी एवं अभक्ष्य न हो।
(ब) जल शुद्धि- जल जीवनी किया हुआ हो, प्रासुक हो, नल का न हो।
(स) अग्नि शुद्धि- ईंधन देखकर, शोध कर उपयोग किया गया हो।
(द) कर्ता शुद्धि- भोजन बनाने वाला स्वस्थ हो तथा नहा-धोकर साफ कपड़े पहने हों। नाखून बड़े न हों। अंगुली वगैरह कट जाने पर खून का स्पर्श खाद्य वस्तु से न हो। गर्मी में पसीने का स्पर्श न हो या पसीना खाद्य वस्तु में न गिरे।

2. क्षेत्र शुद्धि-

(अ) प्रकाश शुद्धि- रसोई में समुचित सूर्य का प्रकाश रहता हो।
(ब) वायु शुद्धि- रसोई में शुद्ध हवा का आना-जाना हो।
(स) स्थान शुद्धि- आवागमन का सार्वजनिक स्थान न हो एवं अधिक अंधेरे वाला स्थान न हो। (द) दुर्गंधता से रहित- हिंसादिक कार्य न होता हो गंदगी से दूर हो।

3. काल शुद्धि-

(अ) ग्रहण काल- चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण का काल न हो।
(ब) शोक काल- शोक, दुःख अथवा मरण का काल न हो।
(स) रात्रि काल- रात्रि का समय न हो।
(द) प्रभावना काल- धर्म प्रभावना अर्थात उत्सव का काल न हो।

4. भाव शुद्धि-

(अ) वात्सल्य भाव- पात्र और धर्म के प्रति वात्सल्य होना।
(ब) करुणा का भाव- सब जीवों एवं पात्र के ऊपर दया का भाव।
(स) विनय का भाव- पात्र के प्रति विनय के भाव का होना।
(द) दान का भाव- कषायरहित, हर्ष सहित ऐसा भोजन हितकारी होता है यानी दान करने का भाव होना।

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